वट पौर्णिमा २०२६ | तारीख, मुहूर्त, महत्त्व, पूजा विधी व सावित्री-सत्यवान कथा
॥ ॐ सावित्र्यै नमः ॥
🌳 **वट पौर्णिमा (वट सावित्री) – २९ जून २०२६** 🌳
वट पौर्णिमा हा ज्येष्ठ महिन्यातील शुक्ल पक्ष पौर्णिमेला साजरा केला जाणारा अत्यंत पवित्र सण आहे. या दिवशी सुवासिनी महिला आपल्या पतीच्या दीर्घायुष्यासाठी, सुख-समृद्धीसाठी व अखंड सौभाग्यासाठी वट (बरगद) वृक्षाची पूजा करतात आणि निर्जल उपवास करतात.
### वट पौर्णिमा २०२६ – तारीख व मुहूर्त
| बाब | तपशील |
|---|---|
| **सणाची तारीख** | **सोमवार, २९ जून २०२६**|
| **पौर्णिमा तिथी प्रारंभ** | २९ जून, पहाटे **०३:०६**|
| **पौर्णिमा तिथी समाप्त** | ३० जून, पहाटे **०५:२६**|
| **पूजेचा शुभ मुहूर्त** | सकाळी **०८:५५ ते १०:४०**|
| **चंद्रोदय (मूनराइज)** | २९ जून, सायंकाळी **७:१६**|
### वट पौर्णिमेचे धार्मिक महत्त्व
| बाब | महत्त्व |
|---|---|
| **सावित्री-सत्यवान कथा** | या दिवशी सावित्रीने आपल्या पतीचे प्राण यमराजाकडून परत मिळवले होते|
| **वटवृक्ष पूजन** | बरगदाच्या झाडाला (वटवृक्ष) **त्रिमूर्तींचे (ब्रह्मा, विष्णू, महेश) स्वरूप** मानले जाते|
| **अखंड सौभाग्य** | या व्रताने वैवाहिक सुख, पतीची दीर्घायुष्य व संतान प्राप्ती होते|
| **वटवृक्षाचा अर्थ** | वट म्हणजे बरगद (Banyan Tree), जो दीर्घायुष्य व अमरत्वाचे प्रतीक आहे|
### सावित्री-सत्यवानची पौराणिक कथा
पौराणिक कथेनुसार, सावित्री ही अत्यंत पतिव्रता व दृढनिश्चयी स्त्री होती. तिचे पती सत्यवान यांना फक्त एक वर्ष आयुष्य होते. नियोजित वेळी, जेव्हा यमराज (मृत्यूचे देवता) सत्यवानांचा जीव घेण्यासाठी आले, तेव्हा सावित्रीने त्यांना पाठीमागे अनुसरण केले. यमराजांनी तिला अनेकदा परत जाण्यास सांगितले, परंतु सावित्री आपल्या निर्धारावर ठाम राहिली. तिच्या अटूट निष्ठा व बुद्धिमत्तेने प्रसन्न होऊन यमराजांनी तिला तीन वरदाने दिली. तिच्या युक्तीने सत्यवानाचा जीव वाचला. ही घटना ज्येष्ठ पौर्णिमेला घडली, म्हणून या दिवशी महिला वटवृक्षाची पूजा करतात.
### वट पौर्णिमा पूजा विधी (Step by Step)
| क्र. | पूजा विधी | कसे करावे? |
|---|---|---|
| **१** | **प्रातः स्नान** | ब्रह्ममुहूर्तात उठून स्नान करा|
| **२** | **संकल्प** | पतीच्या दीर्घायुष्यासाठी व्रताचा संकल्प करा|
| **३** | **वस्त्र व शृंगार** | **नवीन लाल किंवा पिवळी साडी** व सौभाग्याच्या खुणा (मंगळसूत्र, बांगड्या) धारण करा|
| **४** | **पूजा साहित्य** | कलश, रोळी, कुंकू, अक्षता, फुले, धूप, दिवा, फळे, सुपारी, कच्चा सूत (मौली), तांदूळ, हळद तयार करा|
| **५** | **वटवृक्षाची पूजा** | वटवृक्षाला जल अर्पण करा, रोळी-कुंकू, फुले व अक्षता चढवा|
| **६** | **परिक्रमा व सूत बांधणे** | **वटवृक्षाची ७ किंवा १०८ परिक्रमा** करा|
| **७** | **सावित्री-सत्यवान कथा** | पूजेदरम्यान सावित्रीची कथा **श्रवण** करा किंवा वाचा|
| **८** | **आरती व प्रार्थना** | दीपाची आरती करून पतीच्या दीर्घायुष्यासाठी प्रार्थना करा |
| **९** | **दान** | ब्राह्मणांना किंवा गरजूंना दान-दक्षिणा द्या|
| **१०** | **पारण** | **चंद्रदर्शनानंतर** (२९ जून, सायं. ७:१६) जल व सात्विक अन्न ग्रहण करून व्रत सोडा|
### विशेष नियम व आवश्यक साहित्य (Checklist)
- **हे करा (Do's):**
- उपवास (निर्जल किंवा फलाहार) करा
- सासू-सासरच्या पाया पडा
- वटवृक्षाची श्रद्धेने पूजा करा
- **आवश्यक साहित्य (Puja Samagri):**
- **लाल किंवा पिवळी साडी**
- **कच्चा सूत (मौली)** – वटवृक्षाला बांधण्यासाठी
- **कलश** – पाण्याने भरलेला
- **५ प्रकारची फळे** – आंबा, केळी, फणस इ.
- **रोळी, कुंकू, अक्षता, फुले, धूप, दिवा**
### उपसंहार
वट पौर्णिमा ही सावित्रीच्या **पतिव्रता, शौर्य व बुद्धिमत्तेची** आठवण करून देणारी आहे. या व्रताने दाम्पत्यात प्रेम, सुसंवाद व दीर्घायुष्य वाढते व आयुष्यातील संकटे दूर होतात.
**॥ ॐ सावित्र्यै नमः ॥**
**॥ वटवृक्षाय नमः ॥**
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