श्री पांडुरंग अष्टक | शंकराचार्य विरचित | अर्थासह संपूर्ण माहिती | विठ्ठल स्तुती
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
🟨 **श्री पांडुरंग अष्टक – शंकराचार्य विरचित, विठ्ठलाची स्तुती** 🟨
श्री पांडुरंग अष्टक हे **आदि शंकराचार्य** यांनी विरचित केलेले अत्यंत पवित्र व भावपूर्ण स्तोत्र आहे . हे स्तोत्र पंढरपूरचे आराध्यदैवत **श्री पांडुरंग (विठ्ठल)** यांना समर्पित आहे .
‘अष्टक’ म्हणजे **आठ श्लोकांचे** स्तोत्र . या स्तोत्रात विठ्ठलाच्या **रूप, सौंदर्य, लीला, कृपा, परब्रह्म स्वरूपाचे** अत्यंत सुंदर व सखोल वर्णन केले आहे.
**एकूण श्लोक : ९** (१-८ स्तोत्र, ९ फलश्रुती)
### श्री पांडुरंग अष्टकम् – श्लोक व अर्थ (Marathi Meaning)
#### श्लोक १
**॥ महायोगपीठे तटे भीमरथ्या**
**वरं पुंडरीकाय दातुं मुनीन्द्रैः ।**
**समागत्य तिष्ठन्तमानंदकंदं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥१॥**
**अर्थ:** (हे श्रोत्यांनो,) जे **महायोगपीठ** (पंढरपूर) येथे **भीमरथी (चंद्रभागा) नदीच्या** तीरावर, मुनींद्र (श्रेष्ठ मुनी) यांना **पुंडलिकास** (पुंडरीक) वरदान देण्यासाठी समागत (प्रकट) झाले आहेत; जे आनंदाचे कंद (मूळ) आहेत; अशा **परब्रह्मलिंग (परब्रह्मस्वरूप) पांडुरंगाचे** मी भजन करतो.
#### श्लोक २
**॥ तटित्कोटिसंकाशनीलमेघावभासं**
**रमामन्दिरं सुन्दरं चित्रकाशम् ।**
**वरं त्विष्टकायां समन्यस्तपादं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥२॥**
**अर्थ:** जे **विद्युत्कोटी (हजारो वीज) सारख्या** निळ्या मेघासमान (काळ्या) तेजाने प्रकाशमान आहेत; जे **रमा (लक्ष्मी)** चे मंदिर (स्थान) आहेत; जे सुंदर व **चित्रकाश (चित्रविचित्र / आकर्षक)** आहेत; ज्यांनी **एका विटेवर (ईंट)** आपले पाऊल ठेवले आहे (विटेवर उभे राहिले आहेत); अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ३
**॥ प्रमाणं भवाब्धिरिदं मामकानां**
**नितम्बः कराभ्यां धृतो येन तस्मात् ।**
**विधातुर्विसृष्ट्यै धृतो नाभिकोशः**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥३॥**
**अर्थ:** ज्याने आपल्या **दोन्ही हातांनी कटी (नितंब) धारण** केले आहे (धडावर हात ठेवले आहेत); ज्याच्या **नाभीकमळातून** (नाभिकोश) ब्रह्मदेव (विधाता) सृष्टिनिर्मितीसाठी उत्पन्न झाला; जे माझ्यासारख्या भक्तांच्या (मामकानां) भवसागर (भवाब्धि) पार करण्याचे **प्रमाण** (आधार) आहेत – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ४
**॥ स्फुरत्कौस्तुभालंकृतं कंठदेशे**
**श्रिया जुष्टकैयूरकं श्रीनिवासम् ।**
**शिवं शान्तमीड्यं वरं लोकपालं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥४॥**
**अर्थ:** ज्यांच्या **कंठदेशी (गळ्यात) कौस्तुभ मणी** (स्फुरत्कौस्तुभ) अलंकृत आहे; जे **श्रिया (लक्ष्मी)** ने सेविलेले (जुष्ट) कैयूर (बाहुभूषण) असलेले **श्रीनिवास** आहेत; जे **शिव (कल्याणकारी), शांत, ईड्य (स्तवनीय), वर (श्रेष्ठ) व लोकपाल (जगाचे पालनकर्ते)** आहेत – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ५
**॥ शरच्चंद्रबिंबाननं चारुहासं**
**लसत्कुण्डलाक्रांतगंडस्थलान्तम् ।**
**जपारागबिंबाधरं कंजनेत्रं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥५॥**
**अर्थ:** ज्यांचे **मुख (आनन) शरद ऋतूतील चंद्रबिंबासारखे** आहे; ज्यांचा **चारुहास (सुंदर हास्य)** आहे; ज्यांच्या **गंडस्थलांत (गालाच्या भागात) कुंडले** लसत (चमकत) आहेत; ज्यांचे **अधर (ओठ) जपाकुसुम (लाल) रंगासारखे** आहेत; ज्यांचे **नेत्र कमलासारखे** आहेत – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ६
**॥ किरीटोज्ज्वलत्सर्वदिक्प्रान्तभागं**
**सुरैरर्चितं दिव्यरत्नैरनर्घैः ।**
**त्रिभंगाकृतिं बर्हमाल्यावतंसं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥६॥**
**अर्थ:** ज्यांचा **किरीट (मुकुट)** सर्व दिशांच्या प्रांतांना **उज्ज्वल** करतो; ज्यांची **दिव्यरत्ने (अनर्घ्य रत्ने)** व देवांनी (सुरैः) अर्चित (पूजित) आहे; ज्यांची **त्रिभंगाकृती (तीन वेळा वाकलेली मुद्रा)** आहे; ज्यांनी **बर्ह (मोरपिसांची) माला व अवतंस (शिरोभूषण)** धारण केले आहे – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ७
**॥ विभुं वेणुनादं चरन्तं दुरन्तं**
**स्वयं लीलया गोपवेषं दधानम् ।**
**गवां बृंदकानंददं चारुहासं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥७॥**
**अर्थ:** जे **विभु (सर्वव्यापी)** आहेत; जे **वेणुनाद (बासरीचा नाद)** करीत **दुरंत (अद्भुत) विहार** करतात; जे **स्वयं लीलया** **गोपवेष** (गोपाळ / गवळ्याचा वेश) धारण करतात; जे **गवां (गायींच्या) बृंद (समूह)** ला **आनंद** देतात व ज्यांचा **चारुहास** आहे – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### श्लोक ८
**॥ अजं रुक्मिणीप्राणसंजीवनं तं**
**परं धाम कैवल्यमेकं तुरीयम् ।**
**प्रसन्नं प्रपन्नार्तिहं देवदेवं**
**परब्रह्मलिंगं भजे पांडुरंगम् ॥८॥**
**अर्थ:** जे **अज (जन्मरहित)** आहेत; जे **रुक्मिणीचे प्राणसंजीवन (प्राणाधार)** आहेत; जे **परं धाम, कैवल्य (मोक्ष), एक (अद्वितीय) व तुरीय (चैतन्याची चौथी अवस्था)** आहेत; जे **प्रसन्न** आहेत; जे **प्रपन्न (शरण आलेल्यांची) आर्ती (दुःख) हरण** करतात व जे **देवदेव (देवांचे देव)** आहेत – अशा परब्रह्मलिंग पांडुरंगाचे मी भजन करतो.
#### फलश्रुती (स्तोत्रपठणाचे फळ – श्लोक ९)
**॥ स्तवं पांडुरंगस्य वै पुण्यदं ये**
**पठत्येकचित्तेन भक्त्या च नित्यम् ।**
**भवांभोनिधिं तेऽपि तीर्त्वातिकाले**
**हरेरालयं शाश्वतं प्राप्नुवन्ति ॥९॥**
**अर्थ:** जे मनुष्य **एकचित्ताने व भक्तीने** (एकचित्तेन भक्त्या) **नित्य** (रोज) हा **पुण्यद** (पुण्य देणारा) **पांडुरंगाचा स्तव** (स्तोत्र) पठण करतात, ते **भवांभोनिधी (संसारसागर)** ला पार करून (तीर्त्वा) अंती **हरेः (श्रीहरी) आलयं (धाम) शाश्वत (सनातन)** प्राप्त करतात .
### स्तोत्राचे महत्त्व व पठण लाभ
| बाब | तपशील |
|---|---|
| **रचनाकार** | आदि शंकराचार्य |
| **स्तोत्र प्रकार** | अष्टक (आठ श्लोक) – श्री पांडुरंग (विठ्ठल) ची स्तुती |
| **मुख्य स्वरूप** | विठ्ठलाचे रूप, सौंदर्य, लीला, परब्रह्मत्व व कृपा |
| **नियमित पठण लाभ** | भवसागर तरण, मोक्षप्राप्ती, मनःशांती, विठ्ठलकृपा |
| **पठण वेळ** | प्रातःकाळ, संध्याकाळी, **एकादशीला, आषाढी/कार्तिकी वारी** |
| **विशेष** | विठ्ठलाच्या विटेवरील (ईंट) उभ्या स्वरूपाचे सुंदर चित्रण |
### पठण पद्धती
1. स्वच्छ जागी बसून विठ्ठलाच्या चित्रासमोर (कमरेला हात, विटेवर पाय) दिवा लावावा .
2. एकाग्रचित्ताने सर्व ९ श्लोक म्हणावेत (श्लोक १-८ स्तोत्र, ९ फलश्रुती).
3. शेवटी **‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’** किंवा **‘विठ्ठल विठ्ठल जय हरी विठ्ठल’** ११ वेळा जप करावा.
### उपसंहार
‘श्री पांडुरंग अष्टक’ हे विठ्ठलाच्या **दिव्य रूप, लीला व परब्रह्म स्वरूपाचे** दर्शन घडवणारे अत्यंत भावपूर्ण स्तोत्र आहे. याचा नियमित पाठ केल्याने भक्ताला **पांडुरंगाची कृपा** प्राप्त होते, संसारसागर पार होतो व अंती श्रीहरीचे धाम (वैकुंठ) मिळते .
**॥ जय हरी विठ्ठल, जय जय रुक्मिणी माता ॥**
**॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥**
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